Tuesday, 18 March 2014

वन में मोर - ऋता

98

मेघ गरजा

टिप -टिप बरसा

मन हरषा

97

पानी बरसा

सोंधी खुशबू उड़ी

धरती धुली

96

वन में मोर

घटाएँ घनघोर

भावविभोर

95

घटा है आती

बिजली चमकाती

शोर मचाती

94

सह न सका

वाष्पकणों का बोझ

बरसा मेघ

93

बहती धारा

सजाई बालकों ने

कागज़ी नाव

92

प्रथम बूँद

आम की डाल पर

क्यों भूले पेंगे

91

मेघों की कूँची

आकाश कैनवास

उकेरे चित्र

90

ऋतु सावन

शंकर-सा पावन

हुलसा मन

89

हरी चूड़ियाँ

खनकी कलाइयाँ

सावन आया

88

अम्बर -धरा

बँधे एक सूत्र में

बरसात में

87

छतरी तनी

नभ -धरा के बीच

नया आकाश

86

बारिश आती

महावर रचाती

गोरी शर्माती

85

भरे पोखर

मेढक टर- टर

गूँजा शहर

84

बारिश रुकी

पत्तों ने टपकाए

बूँद के मोती

83

दूर क्षितिज़

सतरंगी चुनर

इन्द्रधनुष

-0-

2 comments:

  1. दूर क्षितिज़
    सतरंगी चुनर
    इन्द्रधनुष
    वाह .... अनुपम संयोजन ... नि:शब्‍द करती प्रस्‍तुति

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  2. एक से बढ़ कर एक ... !!

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